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भोजनमाताओं की राज्यव्यापी हड़ताल: शोषण व उत्पीड़न के खिलाफ सड़कों पर उतरीं हजारों भोजनमाताएँ

देहरादून |  उत्तराखंड में मिड-डे-मील योजना से जुड़ी भोजनमाताओं ने सोमवार को राज्यव्यापी हड़ताल कर सरकार और प्रशासन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। देहरादून और डोईवाला समेत कई क्षेत्रों की भोजनमाताएँ बड़ी संख्या में दीनदयाल पार्क, देहरादून में एकत्रित हुईं और सभा आयोजित कर अपनी समस्याओं को मुखर रूप से उठाया।

सभा को संबोधित करते हुए भोजनमाता यूनियन की मंजू ने कहा कि उत्तराखंड की हजारों भोजनमाताएँ वर्षों से बेहद कम मानदेय, अत्यधिक कार्यभार, मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा घोषित 5 हजार रुपये मानदेय आज तक लागू नहीं किया गया है। साथ ही स्कूलों में भोजनमाताओं से उनके कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर सफाई, चौकीदारी, माली और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों जैसे कार्य कराए जा रहे हैं।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव, विरोध पर धमकी

प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की ऋचा ने कहा कि कई स्कूलों में रसोई, गैस चूल्हा, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। भोजनमाताओं को स्कूल खुलने से लेकर बंद होने तक वहां रहना पड़ता है और विरोध करने पर उन्हें काम से निकालने की धमकी तथा अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि भोजनमाताओं को कोई नियमित छुट्टी भी नहीं दी जाती और कई मामलों में अपमानजनक व्यवहार सामने आया है।

न्यूनतम वेतन और समानता पर उठे सवाल

क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के भूपाल ने कहा कि हाल ही में उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू की गई है, लेकिन सरकार न्यूनतम वेतन में भारी असमानता बनाए हुए है। बढ़ती महंगाई के दौर में मजदूर और मेहनतकश वर्ग का जीवन संकट में है। उन्होंने कहा कि जहां एक ओर 25 हजार भोजनमाताएँ बेहद खराब हालात में काम कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्तों में लगातार बढ़ोतरी की जा रही है।

सभा में वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 2018 से अब तक विधायकों के वेतन-भत्ते और पेंशन में दो से तीन बार वृद्धि की गई है। विधायकों का वेतन 2.90 लाख से बढ़ाकर 4 लाख रुपये तथा पेंशन 40 हजार से बढ़ाकर 60 हजार रुपये कर दी गई है। भोजनमाताओं ने सवाल उठाया कि एक ही देश में इतनी भारी असमानता और अन्याय क्यों?

महिला सशक्तिकरण पर सरकार के दावों पर भी सवाल

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तिकरण जैसे अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड का जिक्र करते हुए सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

चेतावनी: मांगें न मानी गईं तो आंदोलन होगा तेज

सभा में वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते भोजनमाताओं की जायज मांगों का समाधान नहीं किया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

भोजनमाताओं की मुख्य मांगें

1. सरकार द्वारा घोषित 5 हजार रुपये मानदेय तत्काल लागू किया जाए।

2.भोजनमाताओं से अतिरिक्त कार्य करवाना बंद किया जाए।

3.न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये लागू किया जाए।

4.स्कूलों में रसोई, गैस, पानी और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जाए।

5.उत्पीड़न, शोषण व अभद्र व्यवहार पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

6.भोजनमाताओं को सम्मान, सुरक्षा और स्थायित्व प्रदान किया जाए।

हड़ताल में मंजू, सरिता, पिंकी, विमला सहित बड़ी संख्या में भोजनमाताएँ शामिल रहीं। आंदोलन के समर्थन में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के भूपाल और प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की ऋचा समेत कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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