दस साल से टूटे पुल का इंतजार, जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे ग्रामीण

पौड़ी के थलीसैंण क्षेत्र में डोरिया और कैन्यूर गांव के बीच सगुड़ी पुल का अब तक नहीं हुआ पुनर्निर्माण, पीठ पर बच्चा बांधकर नदी पार करती महिला का वीडियो सामने आया
पौड़ी। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पौड़ी जिले के थलीसैंण क्षेत्र में डोरिया और कैन्यूर गांव के बीच स्थित सगुड़ी पुल वर्ष 2016 में टूट गया था, लेकिन करीब दस साल बीतने के बावजूद इसका पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है। पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को आज भी जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ रही है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में महिला अपनी पीठ पर बच्चे को बांधकर टूटे पुल के अवशेषों के सहारे नदी पार करती दिखाई दे रही है।
पुल नहीं होने से पांच किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करने की मजबूरी
सगुड़ी पुल के क्षतिग्रस्त होने के कारण ग्रामीणों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। इस दूरी से बचने के लिए लोग टूटे पुल के अवशेषों के सहारे नदी पार करने का जोखिम उठा रहे हैं। बरसात के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर यहां से आवाजाही संभव नहीं हो पाती, जबकि पानी कम होने पर ग्रामीण इसी खतरनाक रास्ते का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।
बच्चे को पीठ पर बांधकर नदी पार करती दिखी महिला
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में ग्रामीण टूटे हुए पुल के अवशेषों के सहारे नदी पार करते नजर आ रहे हैं। इनमें एक महिला अपनी पीठ पर बच्चे को बांधकर नदी पार करती दिखाई दे रही है। इस दौरान संतुलन बिगड़ने पर बड़ा हादसा हो सकता था। वीडियो ने क्षेत्र में सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था नहीं होने की समस्या को फिर सामने ला दिया है।
400 परिवार प्रभावित, विद्यार्थियों को भी परेशानी
पुल का निर्माण नहीं होने से क्षेत्र के करीब 400 परिवार प्रभावित हो रहे हैं। सबसे अधिक परेशानी स्कूली बच्चों, कॉलेज के विद्यार्थियों और रोजमर्रा के काम से थलीसैंण बाजार आने-जाने वाले लोगों को उठानी पड़ रही है। राजकीय इंटर कॉलेज थलीसैंण और डिग्री कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी शिक्षण संस्थानों तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।
2016 से उठ रही पुनर्निर्माण की मांग
कांग्रेस के थलीसैंण ब्लॉक अध्यक्ष विजय बिष्ट ने बताया कि वर्ष 2016 में पुल टूटने के बाद से ही स्थानीय लोग इसके पुनर्निर्माण की मांग शासन और प्रशासन के सामने उठाते आ रहे हैं। इसको लेकर कई बार आंदोलन भी किए गए। स्थानीय प्रशासन की ओर से पुल की डीपीआर तैयार कर निर्माण कराने का आश्वासन दिया गया था, ताकि ग्रामीणों और विद्यार्थियों को आवागमन में सुविधा मिल सके। इसके बावजूद अब तक पुल का निर्माण नहीं हो पाया है।
विजय बिष्ट ने कहा कि पुल के अभाव में सैकड़ों परिवारों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो ग्रामीणों के हित में उग्र आंदोलन किया जाएगा।
वहीं, पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजकुमार ने भी पुल का निर्माण नहीं होने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह का विकास होना चाहिए था, वह आज भी कई इलाकों में दिखाई नहीं देता। उनके अनुसार, करीब दस साल पहले टूटा यह पुल अब तक नहीं बन पाया है और इसका खामियाजा बुजुर्गों, युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ रहा है।
आश्वासनों के बजाय निर्माण की मांग
सगुड़ी पुल की बदहाल स्थिति से ग्रामीणों की मुश्किलें लगातार बनी हुई हैं। करीब एक दशक से पुल के पुनर्निर्माण का इंतजार कर रहे लोगों को अब आश्वासनों के बजाय ठोस कार्रवाई की दरकार है। खासकर विद्यार्थियों, बुजुर्गों और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए पुल का निर्माण स्थानीय लोगों की प्रमुख मांग बन गया है।



